सुबह-ओ-शाम एक ही काम करता हूँ।
दिन रात यूँ ही तमाम करता हूँ।
क्या रह गया अब इस ज़िन्दगी में,
सोचकर यही वक्त के नाम करता हूँ।
मिला जो किस्मत से, नहीं सहेज पाया,
अनमोल खजाना मुफ्त नीलम करता हूँ।
रोता हूँ, मचलता हूँ, भरी महफ़िल में,
बेवजह भरी महफिल में, ताम-झाम करता हूँ।
जान पाएंगे लोग, एकदिन यह हकीकत,
बेदाम के रहे ज़िन्दगी, संग्राम करता हूँ।
हो रहा है, मेरे आसपास जो उल्टा-सीधा,
कोई कहे वाह में तो रामराम करता हूँ।
संत कुमार मालवीय
सोमवार, 12 जनवरी 2009
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